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खिलाफत कमेटी ने खिलाफत हाउस के मामले में वारिस पठान के आरोपों को खारिज कर दिया
ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी ने बुधवार के दिन ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के पूर्व विधायक वारिस पठान की ओर से मुंबई के ऐतिहासिक खिलाफत हाउस के स्वामित्व और इसके परिसर में स्थापित शैक्षणिक संस्थान की कानूनी स्थिति से संबंधित आरोपों को खारिज कर दिया।
कमेटी के ट्रस्टी डॉक्टर रऊफ पठान ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए दावा किया कि इनका मकसद संपत्ति के विकास की योजनाओं में रुकावटें पैदा करना है।
उन्होंने कहा कि ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी कॉलेज ऑफ एजुकेशन की स्थापना 1989 में हुई थी और यह मुंबई यूनिवर्सिटी से संबद्ध है। इस संस्थान से अब तक लगभग 3,600 शिक्षक शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, जिनमें से कई भारत और विदेशों में सेवाएं दे रहे हैं।
डॉक्टर रऊफ पठान, जिन्होंने अमेरिका के अटलांटा शहर में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट जॉर्जिया से शैक्षणिक प्रबंधन का कोर्स किया है, ने कहा कि कमेटी ने अपनी गतिविधियां संचालित करने के लिए आवश्यक अनुमतियां प्राप्त कर ली हैं।
उन्होंने बताया कि प्रस्तावित विकास योजना के तहत खिलाफत हाउस के परिसर में जल्द ही एक अस्पताल और कॉलेज स्थापित किया जाएगा।
कमेटी की यह प्रतिक्रिया वारिस पठान की ओर से शुरू की गई कानूनी कार्रवाई के बीच सामने आई है। वारिस पठान ने खिलाफत हाउस में निर्माण और मरम्मत कार्य रोकने के लिए स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) की याचिका दायर की है। उन्होंने कमेटी के स्वामित्व के दावे और संपत्ति की कानूनी स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
जज वाई एम एच खराडी और सदस्य मोहम्मद मोहिउद्दीन मोईद के समक्ष वारिस पठान के वकील निसार अहमद खान ने मंगलवार को अपनी दलीलें पूरी कीं। उन्होंने दावा किया कि यह संपत्ति वक्फ की है और बी.एड. कॉलेज के कानूनी रूप से काम करने पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि संस्थान के पास चैरिटी कमिश्नर की अनिवार्य मंजूरी मौजूद नहीं है।
इन दावों का विरोध करते हुए रऊफ पठान ने कहा कि यह संपत्ति वक्फ के स्वामित्व में नहीं है। उनके अनुसार, कमेटी को 2003 में संपत्ति के वक्फ के रूप में पंजीकरण से संबंधित कोई अधिसूचना प्राप्त नहीं हुई।
उन्होंने आगे दावा किया कि 2006 में तत्कालीन वक्फ मंत्री आरिफ नसीम खान के कार्यकाल में किए गए सर्वेक्षण या सैटेलाइट मैपिंग में भी इस संपत्ति को शामिल नहीं किया गया था।
ट्रस्टी ने कार्रवाई में जिला कलेक्टर को पक्षकार बनाने का अनुरोध करते हुए कमेटी को बदनाम करने की कथित साजिश की जांच की मांग की। उन्होंने पिछले पांच वर्षों के दौरान चैरिटी कमिश्नर को कथित तौर पर लौटाए गए मूल वक्फ दस्तावेजों के बारे में श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) जारी करने की भी मांग की।
डॉक्टर रफीक जकारिया का हवाला देते हुए उन्होंने मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की योजना का भी ऐलान किया।
दूसरी ओर, स्थगन आदेश की याचिका के समर्थन में निसार अहमद खान ने 13 नवंबर 2003 के वक्फ गजट नोटिफिकेशन का हवाला दिया, जिसमें इस संपत्ति को श्रेणी 'बी' के धार्मिक संस्थानों में शामिल किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस वर्गीकरण को बरकरार रखा है।
खान ने लगभग 150 साल पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड, प्रॉपर्टी कार्ड में किराये के इंद्राज (प्रविष्टियां) न होने, 1926 में सरकार के एक दावे के निपटारे और 1968 से संपत्ति के धार्मिक उपयोग का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि वक्फ के रूप में इस संपत्ति के वर्गीकरण को 22 वर्षों से किसी ने चुनौती नहीं दी है।
उन्होंने आगे कहा कि 2023 से पहले संपत्ति पर सरकार का स्वामित्व साबित नहीं किया गया था और दावा किया कि 1996 के बाद इस मामले में चैरिटी कमिश्नर का क्षेत्राधिकार समाप्त हो चुका था।
आगामी सुनवाई में वक्फ बोर्ड की ओर से दलीलें पेश किए जाने की उम्मीद है, जिसके बाद प्रतिवादियों के वकीलों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा।
कमेटी के ट्रस्टी डॉक्टर रऊफ पठान ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए दावा किया कि इनका मकसद संपत्ति के विकास की योजनाओं में रुकावटें पैदा करना है।
उन्होंने कहा कि ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी कॉलेज ऑफ एजुकेशन की स्थापना 1989 में हुई थी और यह मुंबई यूनिवर्सिटी से संबद्ध है। इस संस्थान से अब तक लगभग 3,600 शिक्षक शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, जिनमें से कई भारत और विदेशों में सेवाएं दे रहे हैं।
डॉक्टर रऊफ पठान, जिन्होंने अमेरिका के अटलांटा शहर में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट जॉर्जिया से शैक्षणिक प्रबंधन का कोर्स किया है, ने कहा कि कमेटी ने अपनी गतिविधियां संचालित करने के लिए आवश्यक अनुमतियां प्राप्त कर ली हैं।
उन्होंने बताया कि प्रस्तावित विकास योजना के तहत खिलाफत हाउस के परिसर में जल्द ही एक अस्पताल और कॉलेज स्थापित किया जाएगा।
कमेटी की यह प्रतिक्रिया वारिस पठान की ओर से शुरू की गई कानूनी कार्रवाई के बीच सामने आई है। वारिस पठान ने खिलाफत हाउस में निर्माण और मरम्मत कार्य रोकने के लिए स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) की याचिका दायर की है। उन्होंने कमेटी के स्वामित्व के दावे और संपत्ति की कानूनी स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
जज वाई एम एच खराडी और सदस्य मोहम्मद मोहिउद्दीन मोईद के समक्ष वारिस पठान के वकील निसार अहमद खान ने मंगलवार को अपनी दलीलें पूरी कीं। उन्होंने दावा किया कि यह संपत्ति वक्फ की है और बी.एड. कॉलेज के कानूनी रूप से काम करने पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि संस्थान के पास चैरिटी कमिश्नर की अनिवार्य मंजूरी मौजूद नहीं है।
इन दावों का विरोध करते हुए रऊफ पठान ने कहा कि यह संपत्ति वक्फ के स्वामित्व में नहीं है। उनके अनुसार, कमेटी को 2003 में संपत्ति के वक्फ के रूप में पंजीकरण से संबंधित कोई अधिसूचना प्राप्त नहीं हुई।
उन्होंने आगे दावा किया कि 2006 में तत्कालीन वक्फ मंत्री आरिफ नसीम खान के कार्यकाल में किए गए सर्वेक्षण या सैटेलाइट मैपिंग में भी इस संपत्ति को शामिल नहीं किया गया था।
ट्रस्टी ने कार्रवाई में जिला कलेक्टर को पक्षकार बनाने का अनुरोध करते हुए कमेटी को बदनाम करने की कथित साजिश की जांच की मांग की। उन्होंने पिछले पांच वर्षों के दौरान चैरिटी कमिश्नर को कथित तौर पर लौटाए गए मूल वक्फ दस्तावेजों के बारे में श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) जारी करने की भी मांग की।
डॉक्टर रफीक जकारिया का हवाला देते हुए उन्होंने मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की योजना का भी ऐलान किया।
दूसरी ओर, स्थगन आदेश की याचिका के समर्थन में निसार अहमद खान ने 13 नवंबर 2003 के वक्फ गजट नोटिफिकेशन का हवाला दिया, जिसमें इस संपत्ति को श्रेणी 'बी' के धार्मिक संस्थानों में शामिल किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस वर्गीकरण को बरकरार रखा है।
खान ने लगभग 150 साल पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड, प्रॉपर्टी कार्ड में किराये के इंद्राज (प्रविष्टियां) न होने, 1926 में सरकार के एक दावे के निपटारे और 1968 से संपत्ति के धार्मिक उपयोग का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि वक्फ के रूप में इस संपत्ति के वर्गीकरण को 22 वर्षों से किसी ने चुनौती नहीं दी है।
उन्होंने आगे कहा कि 2023 से पहले संपत्ति पर सरकार का स्वामित्व साबित नहीं किया गया था और दावा किया कि 1996 के बाद इस मामले में चैरिटी कमिश्नर का क्षेत्राधिकार समाप्त हो चुका था।
आगामी सुनवाई में वक्फ बोर्ड की ओर से दलीलें पेश किए जाने की उम्मीद है, जिसके बाद प्रतिवादियों के वकीलों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा।
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