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महिलाओं के आरक्षण और परिसीमन के विधेयकों के सिलसिले में विपक्ष को विश्वास में लेने का प्रयास
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महिलाओं के आरक्षण और परिसीमन के विधेयकों के सिलसिले में विपक्ष को विश्वास में लेने का प्रयास

Awaz E Bihar
•22 अक्टूबर 2026 को 03:21 pm बजे•3 व्यूज़•5 मिनट पढ़ें

महिलाओं के लिए आरक्षण और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों को फिर से पेश करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से चालू माह के अंत में संसद का विशेष सत्र बुलाने की संभावनाएं एक बार फिर बढ़ गई हैं। लोकसभा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने गुरुवार को संकेत दिया कि ऐसे सत्र की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रस्तावित सत्र सरकार की ओर से विवादित विधायी पैकेज को संसद से पारित कराने का नया प्रयास होगा। इससे पहले बजट सत्र के दौरान सरकार के प्रयास को तब झटका लगा था, जब बिल लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहे थे। सरकारी सूत्रों के अनुसार, अब सत्ताधारी दल समर्थन मजबूत करने के लिए काम कर रहा है और इस उद्देश्य से क्षेत्रीय दलों और विपक्ष के छोटे समूहों से संपर्क किया जा रहा है, ताकि इस बार संवैधानिक संशोधनों की मंजूरी सुनिश्चित की जा सके।

प्रस्तावित कानून के दूरगामी राजनीतिक प्रभाव पड़ने की संभावना है, क्योंकि इसमें दो संवेदनशील मामले शामिल हैं, विधायिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का कार्यान्वयन और निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने के कार्यान्वयन को आगामी जनगणना और उसके बाद होने वाली परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। इस व्यवस्था में किसी भी बदलाव से महिला आरक्षण के कार्यान्वयन के समय, निर्वाचन क्षेत्रों के नए परिसीमन और राज्यों के बीच संसदीय प्रतिनिधित्व के बंटवारे पर बहस फिर से तेज होने की संभावना है। सूत्रों ने बताया कि सरकार संवैधानिक संशोधनों के लिए आवश्यक आंकड़े और समर्थन हासिल करने के उद्देश्य से डीएमके सहित विपक्षी दलों से संपर्क कर रही है। इन संपर्कों से स्पष्ट होता है कि सत्ताधारी दल एक और विधायी विफलता से बचना चाहता है और विशेष सत्र की औपचारिक घोषणा करने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसे आवश्यक समर्थन प्राप्त है।

संसदीय कार्यवाही की वर्तमान स्थिति ने भी प्रस्तावित सत्र के समय को लेकर अटकलों को बढ़ा दिया है। संसद का मानसून सत्र अनिश्चित काल के लिए स्थगित किया जा चुका है, लेकिन इसे औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया गया है। इसलिए आवश्यक प्रक्रियात्मक कार्रवाई पूरी करने के बाद वर्तमान सत्र की एक और बैठक बुलाने की संभावना बनी हुई है। सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि निर्णय होने की स्थिति में सांसदों को लगभग एक सप्ताह पहले सूचित किया जा सकता है।

यद्यपि पहले त्योहारों के आसपास सत्र बुलाने पर चर्चा हुई थी, हालांकि ताजा संकेतों से पता चलता है कि 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के अवसर पर एक संक्षिप्त सत्र बुलाने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है और तारीखों के साथ-साथ विधायी एजेंडे को भी सरकार की अंतिम मंजूरी का इंतजार है। यह प्रस्तावित कदम सरकार और विपक्ष के बीच मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग के कामकाज, विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, के मुद्दे पर बढ़ते तनाव के बीच सामने आया है। विपक्षी दलों ने चुनावी पारदर्शिता और मतदान प्रक्रिया की शुचिता के संबंध में अपना अभियान तेज कर दिया है, जिससे आगामी महत्वपूर्ण चुनावी मुकाबलों से पहले राजनीतिक तनाव में वृद्धि हुई है।

इस पृष्ठभूमि में, संवैधानिक संशोधनों के लिए समर्थन हासिल करने के सरकार के प्रयासों को व्यापक परामर्श और संसद में विस्तृत चर्चा की मांगों का सामना करना पड़ सकता है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में कांग्रेस नेताओं को पत्र लिखकर रचनात्मक सहयोग की अपील की है, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रस्तावित कानून पर विचार-विमर्श और विशेष सत्र की औपचारिक घोषणा से पहले उचित बहस सुनिश्चित करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। विपक्ष की आशंकाओं का केंद्र परिसीमन के संवैधानिक और राजनीतिक परिणाम होंगे, विशेष रूप से राज्यों के बीच संसदीय सीटों का आवंटन और संघीय संतुलन को निष्पक्ष रखने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय। दक्षिणी राज्यों ने आशंका व्यक्त की है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के नए पुनरावंटन से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में प्रगति के बावजूद संसद में उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

इसलिए सरकार को न केवल संसद में आवश्यक बहुमत हासिल करने की समस्या से निपटना होगा, बल्कि संघीय समानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी व्यापक आशंकाओं का भी जवाब देना होगा।

संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, संवैधानिक संशोधन विधेयकों के पारित होने के लिए सामान्यतः संसद के प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। कुछ संशोधनों के लिए कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं के अनुसमर्थन की भी आवश्यकता होती है। हालांकि, सटीक शर्तें प्रस्तावित विधेयकों के प्रावधानों पर निर्भर करेंगी। आवश्यक समर्थन हासिल करने में सरकार को पहले हुई कठिनाइयों को देखते हुए क्षेत्रीय दलों का समर्थन निर्णायक साबित हो सकता है।

सरकार के लिए विशेष सत्र अपने विधायी एजेंडे को फिर से आगे बढ़ाने और राजनीतिक वार्ता के माध्यम से पिछली विफलता पर काबू पाने का प्रदर्शन करने का अवसर होगा।

दूसरी ओर, विपक्ष के लिए यह इस बात की एक और परीक्षा होगी कि वह ऐसे कानून के मामले में विभिन्न दलों के बीच किस हद तक तालमेल बिठा सकता है, जिसमें संवैधानिक सुधारों के साथ-साथ चुनावी राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की संभावना है।

फिलहाल सरकार ने औपचारिक घोषणा करने से परहेज किया है। हालांकि, लोकसभा के उच्च सूत्रों द्वारा विशेष सत्र की संभावना को खारिज न किए जाने और क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करने के कथित प्रयासों ने अक्टूबर में सत्र बुलाने की संभावना को एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

अब मुख्य सवाल यह हैं कि क्या सरकार औपचारिक रूप से विशेष सत्र बुलाएगी, क्या वह जरूरी बहुमत हासिल कर पाएगी, और क्या संसद में वोटिंग से पहले विपक्ष को प्रस्तावित संवैधानिक बदलावों की समीक्षा करने और उन पर चर्चा करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा।
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