आस्था की कविता दायरे में रहकर नहीं चलनी चाहिए: इजाज़ अली अरशद
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पटना : (एबीएन) साहित्य अकादमी नई दिल्ली व खानकाह शाह अर्जनी के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन 'उर्दू में भक्ति काव्य' विषय पर किया गया। सेमिनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध विद्वान जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली के इस्लामिक अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व वाइस चांसलर जोधपुर विश्वविद्यालय और पद्मश्री प्रोफेसर अख्तरुल वासे ने की। जबकि संचालन की जिम्मेदारी देश के प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि व साहित्यकार डॉक्टर जीन रामेश ने बखूबी निभाई। स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए अनुपम तिवारी ने विषय के परिप्रेक्ष्य पर चर्चा करते हुए जोर दिया कि भक्ति काव्य देश के माहौल को सुगम बनाने में एक महत्वपूर्ण कदम है। चूंकि भक्ति का संबंध मानवीय भावनाओं से है, इसलिए भक्ति काव्य मानवीय भावनाओं को प्रेरित करने का काम करता है। उन्होंने कहा कि उर्दू में नजीर अकबराबादी जैसा कवि किसी भी भाषा में नहीं है। उनके पास इतने विषय हैं और कृष्ण पर जो लिखा है वह महत्वपूर्ण हैं। उनकी कविता में धार्मिक सहिष्णुता और अंतर-धार्मिक सौहार्द के बड़े प्रतीक थे। उनकी भक्ति कविता किसी एक धर्म तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने इस्लामिक व्यक्तित्व और हिंदू पौराणिक पात्रों दोनों के लिए समान भक्ति का प्रदर्शन किया। हिंदुस्तान की जमीन है और हिंदुस्तान की जमीन पर आध्यात्मिकता है, मानवता हमारे रक्त में बसी हुई है जिसे गंगा-जमुनी संस्कृति कहें या भक्ति का प्रदर्शन। खानकाह शाह अर्जनी के सज्जादा नशीन प्रोफेसर सैयद शाह हुसैन अहमद ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उर्दू में भक्ति काव्य पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन अपने प्रकार के अनुसार पहला और अनोखा सेमिनार है। वर्तमान समय में इस विषय का बहुत महत्व है। भक्ति काव्य एक ऐसा विषय है जो समाज में सौहार्द और भाईचारा पैदा करने का काम कर सकता है। प्रोफेसर अख्तरुल वासे ने भक्ति काव्य के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भक्ति काव्य में हिंदुस्तान की लंबी इतिहास और प्राचीन संस्कृति निहित है, इसलिए हमें अपनी संस्कृति और इतिहास को जानने के लिए आवश्यक है कि भक्ति काव्य के अध्ययन को आम करें। डॉक्टर अहमद मफूज ने मुख्य भाषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उर्दू में भक्ति काव्य की शुरुआत दक्कन से हुई। प्राचीन कवियों जैसे कि कुली कुतुब शाह और नसरती से लेकर क्लासिकल युग के मीर ताकी मीर और मिर्जा गालिब तक, हर बड़े कवि ने अपनी भक्ति का प्रदर्शन किया। भक्ति काव्य ने समाज में नैतिक मूल्यों के प्रसार और एकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह कविता सूफी संतों के खानकाहों से लेकर सार्वजनिक मुशायरों तक हर जगह लोकप्रिय है। इस काव्य के माध्यम से सामान्य व्यक्ति को अपने पवित्र व्यक्तित्वों के जीवन से मार्गदर्शन मिलता है। भक्ति काव्य उर्दू भाषा का वह पूंजी है जो इसे अन्य भाषाओं से अलग बनाता है। यह कविता दिलों को शांति प्रदान करने के साथ-साथ विश्वास की दृढ़ता का साधन भी है। भक्ति काव्य उर्दू साहित्य की वह आत्मा है जो कभी पुरानी नहीं होती। यह कविता मानव को सांसारिक दुनिया से निकालकर एक ऐसी आध्यात्मिक दुनिया में ले जाती है जहां केवल शांति, प्रेम और मानवता का सम्मान है। यह साहित्य और धर्म का वह सुंदर संगम है जो उर्दू भाषा की जीवनदायिनी है। खानकाह शाह अर्जनी के वर्तमान सज्जादा नशीन प्रोफेसर सैयद शाह हुसैन अहमद ने प्रेम के संदेश को आम करने के लिए इस विषय का चयन बड़ी बुद्धिमत्ता से किया है। इतिहास के महान और वृद्ध व्यक्तित्व से अपनी भक्ति का प्रदर्शन देश के सभी लेखकों ने किया। हिंदू और मुस्लिम कवियों ने जहां पैगंबर की शान में नात लिखी है, वहीं राम और कृष्ण जी के चमत्कार में हृदय की भेंट पेश की है। मुख्य भाषण के बाद उर्दू कविता और साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार और कवि पटना विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष उर्दू विभाग, मौलाना मुजाहिरुल हक अरबी फारसी विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर प्रोफेसर एजाज अली रशद ने अध्यक्षीय भाषण का फریज़ किया। अध्यक्षीय भाषण के दौरान उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भक्ति काव्य में बड़े सावधानी और दायरे में रहकर कविता का प्रदर्शन करना चाहिए, लेकिन यह सच्चाई है कि उत्साह और मस्ती में मानवीय भक्ति अतिशयोक्ति की सीमा तक पहुंच जाती है, इसलिए इस प्रकार की भक्ति काव्य को सुंदर कविता के दर्पण में देखना चाहिए। प्रोफेसर एजाज अली रशद के अध्यक्षीय भाषण के साथ ही उद्घाटन सत्र का समापन हो गया। अंत में डॉक्टर हुमायूं अख्तर ने मेहमानों, प्रतिभागियों और लेखकों का आभार व्यक्त करते हुए भोजन की घोषणा