के वाई सी आतंक का राज! पहचान के नाम पर सरकारी शिकंजा, आम आदमी कागजों में कैद, नज़हत जहां
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क्या अब जीने के लिए भी सरकारी अनुमति आवश्यक है?
मुजफ्फरपुर (प्रतिनिधि)
देश का आम नागरिक आज नागरिक नहीं रहा, बल्कि हर पल एक संदिग्ध अभियुक्त बना दिया गया है। जीवन के हर मोड़ पर एक ही सवाल, पहले अपनी पहचान साबित करो, फिर जीने का अधिकार मांगो! पूर्व जिला परिषद उम्मीदवार और शैक्षिक केंद्र की प्रदेश उपाध्यक्ष नज़हत जहां ने केवाईसी प्रणाली पर जोरदार और आक्रामक हमला बोलते हुए कहा कि "सरकार ने केवाईसी को सुविधा नहीं, सजा बना दी है। यह डिजिटल सुधार नहीं बल्कि खुली डिजिटल तानाशाही है।"
आधार, पैन, राशन कार्ड, गैस सिलेंडर, बैंक खाता, मोबाइल सिम हर सुविधा पर एक ही आदेश सुनाई देता है: पहले केवाईसी, बाद में अधिकार! नज़हत जहां ने कहा कि केवाईसी की एक छोटी सी गलती पूरे घर को बर्बाद कर देती है किसी गरीब का राशन बंद, किसी बुजुर्ग की पेंशन रोक दी गई, किसी मजदूर का गैस सिलेंडर अटक गया, किसी महिला का बैंक खाता फ्रीज, और एकमात्र कारण? केवाईसी नहीं हुआ! उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में हालात अत्यंत भयावह हैं। कहीं नेटवर्क फेल, कहीं सर्वर डाउन, कहीं अंगूठा मशीन से मैच नहीं करता, कहीं खुद मशीन जवाब दे देती है, लेकिन सजा हमेशा इंसान को ही मिलती है, नज़हत जहां ने प्रणाली से टकराते हुए तीखे सवाल उठाए:
अगर आधार पहचान है तो बार-बार केवाईसी क्यों? अगर गलती मशीन की है तो सजा इंसान को क्यों? पहले भूख मिटाई जाए या पहले पहचान साबित की जाए? नज़हत जहां ने दो टूक शब्दों में कहा: "निगरानी के नाम पर सरकार आम आदमी की आजादी पर हमला कर रही है। आज हालात यह हैं कि भूख से ज्यादा डर केवाईसी का है। राशन से ज्यादा जरूरी पहचान हो गई है, और जीवन से ज्यादा जरूरी एक नंबर!" जनता में गुस्सा उबाल पर है। लोग सवाल कर रहे हैं: "क्या सरकार योजनाएं देने आई थी या अधिकार छीनने?" अंत में नज़हत जहां ने सबसे बड़ा और खतरनाक सवाल खड़ा किया, क्या भारत का आम नागरिक अब इंसान नहीं रहा, सिर्फ एक केवाईसी नंबर बनकर रह गया है? यह सिर्फ एक खबर नहीं है, जनता की चीख है— जो अब कागजों, नंबरों और मशीनों के बीच दम तोड़ रही है!