बड़ी शक्तियाँ अपनी राजनीतिक और सैन्य श्रेष्ठता के बल पर छोटे और कमजोर देशों को दबाने की कोशिश कर रही हैं: शमीम मुनेमी
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पटना : (एबीएन) दाइ-ए-वहदत, हामी मासाकीन, शहीद-ए-राह-ए-हक हज़रत आयतुल्लाह अल-उज़मा सैयद अली हुसैनी ख़ामेनई की शहादत पर बिहार की प्रमुख मिली, सामाजिक और धार्मिक संगठनों और ख़ानकाहों की ओर से एक संवेदना सभा बिहार उर्दू अकादमी के कॉन्फ़्रेंस हॉल में आज ख़ानकाह-ए-मुनअमिया क़ुमरिया मीतन घाट के सज्जादानशीन हज़रत मौलाना सिस शाह शमीम अल-यद अहमद मुनअमी की अध्यक्षता में आयोजित हुई। इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय भाषण में ख़ानकाह-ए-मुनअमिया क़ुमरिया मीतन घाट के सज्जादानशीन मौलाना सैयद शाह शमीम उद्दीन मुनअमी ने वर्तमान वैश्विक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज दुनिया में शक्ति के बल पर कमज़ोर देशों की संप्रभुता को पामाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इज़राइल की साम्राज्यवादी नीतियों ने न केवल मध्य-पूर्व बल्कि पूरी दुनिया की शांति और स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। बड़ी शक्तियाँ अपनी राजनीतिक और सैन्य श्रेष्ठता के बल पर छोटे और कमज़ोर देशों को दबाने की कोशिश कर रही हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय न्याय और मानवीय मूल्यों के सरासर विरुद्ध है। मौलाना मुनअमी ने कहा कि ईरान के निर्वाचित सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह अली ख़ामेनई के खिलाफ भी वैश्विक स्तर पर तरह-तरह की साज़िशें रची गईं। उन पर राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दबाव डालकर उन्हें झुकाने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने ज़ुल्म और ज़बरदस्ती के सामने सर تس्लीम करने के बजाय استक़ामत, हौसला और जुर्रत का मुज़ाहिरा किया। उन्होंने कहा कि हक़ के अलमबरदार हमेशा आज़माइशों से गुज़रते हैं, मगर इतिहास गवाह है कि सच्चाई और सिद्धांतों पर क़ायम रहने वाले ही आख़िरकार सरफ़राज़ होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इस्लाम हमें ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने और माज़लूमों का साथ देने की तालीम देता है। दुनिया की कोई ताक़त हक़ और सदाक़त की आवाज़ को दबाने में कामयाब नहीं हो सकती। जो रهنुमा ज़ुल्म के आगे झुकने के बजाय हक़ का परचम بلند रखते हैं, वे ही मिल्लत और इंसानियत के लिए उम्मीद और हौसले की निशानी बन जाते हैं। मौलाना शमीम अल-यद अहमद मुनअमी ने अपने भाषण के अंत में कहा कि आज ज़रूरत इस बात की है कि पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा एकता, बیدारी और शऊर के साथ बातिल ताक़तों के ख़िलाफ़ खड़ी हो और दुनिया में अमन, इन्साफ़ और इंसानी वक़ार के قियाम के लिए जद्द-ओ-जेहद जारी रखे। उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला दुनिया को ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी से निजात अता फरमाए और हक़ और अदल की सरबलंदी नसीब करे। संवेदना सभा के अवसर पर अपने स्वागत्य भाषण प्रस्तुत करते हुए मजलिस उलमा व खुतबा इमामिया, बिहार के जनरल सेक्रेटरी मौलाना इमामत हुसैन ने कहा कि मरहूम की वफ़ात मिल्लत इस्लामिया के लिए एक बड़ा سانहा है। उन्होंने कहा कि मरहूम ने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन और मिल्लत की सेवा में गुज़ारी। उनकी इल्मी और सामाजिक सेवाओं को हमेशा क़द्र की निगाह से देखा जाएगा। मौलाना ने कहा कि ऐसे बाक़दार और मुख़लिस व्यक्तियों की कमी आसानी से पूरी नहीं होती। उन्होंने आगे कहा कि मरहूम की शख़्सियत इल्म, तक़वा और अख़लाक़ का हुस्न थी। उनकी सेवाएं हमेशा अहल-ए-इल्म और मिल्लत के लिए मशعل-ए-राह बनी रहेंगी। अंत में उन्होंने मरहूम की मग़फ़िरत और पीछे रह जाने वालों के लिए सब्र-ए-जमील की दुआ की। शरई अदालत बिहार, ओडिशा और झारखंड के नाज़िम हज़रत मुफ़्ती सईदुर्रहमान कासमी ने अपने भाषण में कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनई की शहादत ने आलम-ए-इस्लाम में एक नई रूह और बيدारी पैदा कर दी है। उन्होंने कहा कि ऐसे अज़ीम रهنमाओं की क़ुरबानियाँ उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए मशعل-ए-राह होती हैं। मिल्लत-ए-इस्लामिया को चाहिए कि वे उनकी जद्द-ओ-जेहद, इस्तिक़ामत और क़ुरबानी से सबक़ हासिल करे और इत्तिहाद और वحدत को फ़रोग़ दे। मुफ़्ती साहब ने अफ़सोस का इज़हार करते हुए कहा कि आज भी उम्मत के अंदर इफ़तिराक़ और बाहमी इख़तिलाफ़ात का माहौल है और सोशल मीडिया पर लायेनी और ग़ैर संजीदा बातों का सिलसिला जारी है, जो मिल्लत के लिए नुक़सानदेह है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस तर्ज़-ए-अमल को फ़ौरी तौर पर ख़त्म किया जाना चाहिए और उम्मत को संजीदगी और शऊर के साथ अपने मसलों के हल की तरफ़ तवज्जो देनी चाहिए। इस अवसर पर जमात-ए-इस्लामी बिहार के अमीर हलक़ा मौलान