अल्लाह का ज़िक्र करने से दिल में नूरानियत पैदा होती है: अमीर शरीयत
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पटना : अमीर-ए-शरीयत, मौलाना सैयद अहमद वली फैसल रहमानी साहब ने दरस-ए-हदीस के आखिरी सबक में कहा कि हदीस की किताब की शुरुआत में इमाम बुखारी ने नियत की हदीस का उल्लेख किया है और आखिर में जिक्र-ए-इलाही से संबंधित हदीस का बयान करके इस ओर इशारा किया है कि जो काम इखलास और रिदा-ए-इलाही के जज्बे से किया जाता है, वह कम होने के बावजूद मीजान-ए-अदल में वजनी हो जाता है। इसलिए सबحान अल्लाह व बिहम्दिही सबहान अल्लाह अल-अजीम का कस्रत से ورد करते रहना चाहिए, इससे ईमान और यकीन में ताजगी और फिक्र व अमल में नूरानियत और रूहानियत पैदा होती है।
मौलाना सैयद अहमद वली फैसल रहमानी साहब ने आखिरी हदीस का सबक देते हुए कहा कि कयामत के दिन अमल और अकवाल भी तौले जाएंगे और इसके आधार पर फैसले होंगे, उन्होंने कहा कि जिक्र-ए-इलाही सबहान अल्लाह व बिहम्दिही सबहान अल्लाह अल-अजीम बहुत ही आसान कलमे हैं जो जुबान पर आसानी से चढ़ते हैं, हमें इसका बराबर एहतेमाम करना चाहिए।
दरस-ए-हदीस से पहले दरालुलूम के होनहार तालिब-ए-इल्म ने उर्दू, अरबी, अंग्रेजी, फारसी और हिंदी जुबान में पुरमगज और दिलकश तकरीरें की, जिससे सामियान पर बड़ा गहरा असर हुआ और लोगों ने इन बच्चों के लिए दिल से दुआएं कीं।
दरालुलूम के सेक्रेटरी काजी वासी अहमद कासमी ने कहा कि दरालुलूम अल-इस्लामिया अकाबिर-ए-इमारत शरिया के ख्वाबों की हसीन ताबीर है, अगर आपका खास तआवुन जारी रहे तो हम इसे और आगे बढ़ा सकते हैं।
इस मौके पर मौलाना मुफ्ती सना अल-हुदा कासमी साहब ने कहा कि दरालुलूम अल-इस्लामिया एक ऐसा नमूना इदारा है जहां तालीम के साथ मियारी तरबियत भी दी जाती है, इसलिए यह मुल्क के मुम्ताज इदारों में शुमार किया जाता है।
मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अहतकाम अल-हक कासमी साहब ने कहा कि इस इदारे ने कुल हदीस की मियाद में नुमाया तरक्की हासिल की है, यहां के बुजुर्गों के इखलास व लिल्लाही का ثمرा है।
इस मजलिस में शहर पटना और इसके मुजाविरात से तशरीफ लाने वाले कई अरबाब-ए-फिक्र व नज़र व दानिशवरान-ए-मिल्लत और समाजी खिदमतगारों ने दरालुलूम के निजाम व इन्साराम को देखकर दिली मसर्रत का इज़हार किया और दुआएं दीं।