भागलपुर में अन्जुमन-ए-बाग-ओ-बहार में काव्य संग्रह 'खाक-ए-दिल' के कवि जान निसार अख्तर को याद किया गया।
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अंजुमन-ए-बाग-ओ-बहार, ब्रह्मपुरा, भागलपुर के तत्वावधान में जान निसार अख्तर के जन्मदिन पर नोशीन जहां के निवास पर जोश मलीहाबादी की अध्यक्षता में एक साहित्यिक सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अंजुमन के महासचिव डॉक्टर मोहम्मद परवेज ने जान निसार अख्तर के जीवन और साहित्यिक कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित जान निसार अख्तर प्रगतिशील कविता का एक चमकता सितारा था, जिसकी कविताई की महानता से इनकार नहीं किया जा सकता। वह एक ही समय में गजलकार, नज्मकार, मार्सियाकार, कत'आकार, गीतकार, रुबाईकार, मसनवीकार, लेखक आदि थे। उन्होंने अपनी गजलों को प्रेम और मोहब्बत के रंग में डुबो कर उनमें रोमांस पैदा किया। उनका असली नाम सैयद जान निसार हुसैन रिजवी अख्तर और कलमी नाम जान निसार अख्तर था। 8 फरवरी 1914 को ग्वालियर में जन्मे और 18 अगस्त 1976 को मुंबई में निधन हो गया। पिता का नाम खान बहादुर सैयद इफ्तिखार हुसैन रिजवी और कलमी नाम मुज्तर खैराबादी था, जो क्लासिकी कविता के प्रतिनिधि कवि थे, माता का नाम बदरुन्निसा और पत्नी का नाम सफिया अख्तर था, जो इसरारुल हक मजाज की बहन थीं और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में लेक्चरर और प्रसिद्ध लेखिका थीं। उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर से मैट्रिक किया। अलीगढ़ विश्वविद्यालय से एमए गोल्ड मेडल प्राप्त किया। वह विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर में लेक्चरर रहे, फिर बाद में हमीदिया कॉलेज भोपाल में उर्दू और फारसी विभाग के प्रमुख बने। कुछ सालों के बाद वह मुंबई चले गए और फिल्मी दुनिया से जुड़ गए और फिर पूरी जिंदगी फिल्मों से जुड़े रहे, उन्होंने लगभग डेढ़ सौ फिल्मों के लिए गीत लिखे। वह 1947 से 1949 तक प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। उनकी रचनाओं में सिलसिले, तार-ए-गिरेबान, जादू, घर आंगन, खामोश आवाज, नज्र-ए-бутान, पिछले पहर, हजारों बातें, हिंदुस्तान हमारा, سکूट शाब, हरफ-ए-आशना (पत्रों का संग्रह) आदि प्रमुख हैं। उन्हें कई पुरस्कार भी मिले, जिनमें गालिब पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार आदि शामिल हैं। उनकी प्रमुख नज्मों में नज्र-ए-बुतान, अफशा-ए-राज, याद है अभी तक, दूर रात भर कोई गाता रहा, किसी को देखकर, जिंदगी के मोड़ पर, इकबाल, एक पल, गर्ल्स कॉलेज की लारी, आखिरी मुलाकात, साज-ए-वफा, एक इल्तिजा, एक खातून से, मोहब्बत, तुम्हारे शहर में, खानाबदोश, आदमी का गीत, सेवेरा, देहात की शाम, आजादी आदि प्रमुख हैं। इस अवसर पर जोश मलीहाबादी ने कहा कि जान निसार अख्तर की गजलों का रंग-तार और नज्मों में भी गजल की लताफतें अपनी सभी खूबियों के साथ झलकती हैं। डॉक्टर सैयद नीर हसन ने कहा कि जान निसार अख्तर आधुनिक गजल के मुनफरद कवि थे, उनकी शख्सियत में भी जान निसारी और दिलदारी थी। डॉक्टर हबीब मर्शद खान ने कहा कि जान निसार अख्तर की शायरी जग बीती नहीं है, यह अपनी बीती है। सभा में शामिल मोहम्मद शादाब आलम, डॉक्टर हिफजुर रहमान, सैयद मुमताज अजीमी उर्फ मंटो कलाकार नोशीन जहां, मोहम्मद मुब्बशीर आलम ने जान निसार अख्तर के फन से अपने विचार व्यक्त किए।