बिहार विधानसभा चुनाव 2025 देश की महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक के रूप में याद रखा जाएगा
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पटना, 30 दिसंबर (एबीएन) बिहार विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का रिकॉर्ड दसवीं बार राज्य की बागडोर संभालना न केवल इस राज्य बल्कि देश के राजनीतिक परिदृश्य में गुजरते साल की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना रही। साल की शुरुआत में स्वास्थ्य के आधार पर आलोचकों द्वारा खारिज किए जा रहे श्री कुमार ने अपनी राजनीतिक कुशलता और स्वच्छ छवि के बल पर चुनावी मैदान में अपने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया और राजनीतिक बहसों में विकास की राजनीति को नई ताकत दी। इसके बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने इस चुनाव को बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ घोषित किया। राज्य के युवा नेता नितिन नवीन का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनना भी बिहार के लिए इस साल एक महत्वपूर्ण घटना रही। वर्ष 2025 में जब पूरे देश की निगाहें बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव पर केंद्रित थीं, उस समय अधिकांश राजनीतिक पंडितों के अनुमानों के अनुसार यह चुनाव "सुशासन बाबू" के नाम से प्रसिद्ध मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर का अंतिम पड़ाव साबित होने वाला था। नवंबर में आयोजित 243 सीटों वाली राज्य विधानसभा के चुनाव में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की चुनावी आंधी ने राज्य के शासन को प्राप्त करने का सपना देख रहे महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव, उपमुख्यमंत्री बनने के इच्छुक मुकेश सहनी और प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज के तीसरे मोर्चे के सपनों को ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने यहां तक आरोप लगाया था कि नीतीश कुमार बिहार के केवल नाममात्र के मुख्यमंत्री हैं जबकि सरकार दिल्ली से भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्य में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी चला रहे हैं। तेजस्वी यादव ने कई बार कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अर्ध-मूर्छा की स्थिति में हैं और राज्य में कानून और व्यवस्था सहित कई मुद्दों से वे अनभिज्ञ हैं। जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर तो यह कहने लगे थे कि नीतीश कुमार का स्वास्थ्य मुख्यमंत्री बने रहने के लायक नहीं है और अगर यह बात सच नहीं है तो सरकार को उनकी ताजा स्वास्थ्य स्थिति पर एक मेडिकल बुलेटिन जारी करके इसका खंडन करना चाहिए। भाजपा ने विपक्ष की ओर से एनडीए के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार पर बढ़ते हमलों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं किया था कि चुनाव के बाद नीतीश कुमार ही बिहार के मुख्यमंत्री होंगे। केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव की तारीख के घोषणा से पहले यह कहकर विपक्ष को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा दे दिया था कि चुनाव के बाद एनडीए के नवनिर्वाचित विधायक मुख्यमंत्री के लिए अपना नेता चुनेंगे। चुनाव परिणाम की घोषणा पर नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को जबरदस्त कामयाबी मिली और उनकी पार्टी का संख्यात्मक बल पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले 43 से बढ़कर 85 हो गया। सत्ता के दूसरे बड़े दावेदार महागठबंधन महज 35 सीटों तक सिमट कर रह गया। परिणामों में जनता दल (यूनाइटेड) की मजबूती के साथ एनडीए को 202 सीटों पर शानदार बहुमत मिलने के बाद भाजपा के पास नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा, इसलिए उन्होंने 20 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव और उससे पहले विपक्ष की ओर से गंभीर चुनौतियों का सामना किया। विपक्षी दलों ने शराबबंदी की विफलता और कानून-व्यवस्था के संदर्भ में उन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि बिहार में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कई ऐसे कदम उठाए जिनके परिणामस्वरूप पुलिस प्रशासन ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई सुविधाएं प्रदान करना शुरू किया। महिलाओं में आर्थिक सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना शुरू की गई, जिसके तहत मुख्यमंत्री ने स्वयं महिलाओं के खातों में दस-दस हजार रुपये ट्रांसफर किए। इसके साथ ही उन्होंने वादा किया कि जिन महिलाओं के रोजगार बेहतर तरीके से चलेंगे, उन्हें आगामी छह महीनों में व्यवसाय के लिए अलग से दो लाख रुपये दिए जाएंगे। हालांकि महागठबंधन की ओर से यह तर्क देने की कोशिश की गई कि यह अनुदान नहीं बल्कि "ऋण की राशि" है, लेकिन शायद इसका जनता पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। महिलाओं के लिए चलाई गई कई योजनाओं का प्रभाव यही रहा कि इस बार के चुनाव में 71.6 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाले, जो