पटना (एबीएन) लексिकोग्राफी एक धैर्य और निरंतर परिश्रम की मांग करने वाली प्रक्रिया है। ज़बीर अहमद ने साबित किया है कि वे इस जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी, अनुसंधान और विद्वान दृष्टि के साथ निभाने में सक्षम हैं। ज़बीर अहमद द्वारा संकलित त्रिभाषी शब्दकोश 'प्रमाणिक हिंदी अंग्रेजी उर्दू' केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भाषा, संस्कृति और विचारधारा का एक विश्वसनीय संदर्भ है। लексिकोग्राफी के संबंध में विद्वानों ने सरकारी उर्दू पुस्तकालय के सम्मेलन कक्ष में आयोजित एक विद्वान सभा में अपने विचार व्यक्त किए।
बिहार विधान परिषद के उपाध्यक्ष राम वचन राय ने त्रिभाषी शब्दकोश के लिए ज़बीर अहमद भागलपुरी को बधाई देते हुए कहा कि लексिकोग्राफी का काम तो कोई संस्था करती है, लेकिन ज़बीर अहमद ने जिस तरह से इस काम को पूरा किया है, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि उपन्यास, कहानी और कविता लिखना तो रोचक काम है, लेकिन लексिकोग्राफी और नए शब्दों के अर्थ तैयार करना बहुत ही कठिन काम है, जिसमें धैर्य, संतुष्टि और धैर्य की परीक्षा होती है। इसलिए ज़बीर अहमद बधाई के पात्र हैं और उनकी प्रेरणा की जानी चाहिए।
बिहार विधान परिषद के सदस्य आफाक अहमद खान ने कहा कि लексिकोग्राफी पर काम करने वाली हस्तियों को कम ध्यान मिलता है। लексिकोग्राफी पर काम करने वाले को हमारा समाज उतना महत्व नहीं देता और उन्हें पर्याप्त प्रशंसा नहीं मिलती। इसके बावजूद ज़बीर अहमद ने यह काम पूरा किया है, जिसके लिए वे प्रशंसनीय हैं। उन्होंने कहा कि किसी पुस्तक की पहचान उसके लेखक और प्रकाशक से होती है। ज़बीर अहमद के इस शब्दकोश को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित करके स्वयं यह साबित कर दिया है कि ज़बीर अहमद का यह विद्वान कार्य किस स्तर का है। उनके लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
उर्दू निदेशालय के निदेशक एसएम परवेज ने कहा कि भाषा और साहित्य के विकास और इसके प्रसार में शब्दकोश का बहुत महत्व है। भाषा और साहित्य के विचार में शब्दकोश का दिल और दिमाग का स्थान है। भाषा और साहित्य के प्रसार में शब्दकोश का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हर युग में भाषा और साहित्य में भी परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है और इसके लिए नए शब्दों और अर्थों की आवश्यकता होती है। इसलिए लексिकोग्राफी का महत्व और भी बढ़ जाता है।
सरकारी उर्दू पुस्तकालय के अध्यक्ष अरशद फिरोज ने भी लексिकोग्राफी को सबसे कठिन काम बताया और इसके लिए उन्होंने ज़बीर अहमद का स्वागत किया। इस अवसर पर खुदाबख्श पुस्तकालय के डॉ मोहम्मद जाकिर हुसैन ने भी लексिकोग्राफी के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए और कहा कि लексिकोग्राफी एक कठिन, कठिन और धैर्य की मांग करने वाली प्रक्रिया है। इससे यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि ज़बीर अहमद ने इसे कितनी मेहनत से पूरा किया है। उन्होंने कहा कि दबिस्तान अजीमाबाद में 1970 में मोहम्मद यूसुफ उद्दीन अहमद बलखी ने बिहार उर्दू शब्दकोश के नाम से एक अलग प्रकार का शब्दकोश तैयार किया था, जिसमें बिहारी शब्दों और मुहावरों की व्याख्या की गई है। अहमद यूसुफ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 1999 में इसका दूसरा संस्करण प्रस्तुत किया। 1972 में प्रोफेसर कलीमुद्दीन अहमद ने अंग्रेजी और उर्दू शब्दकोश तैयार की। कलीमुद्दीन अहमद की इस परंपरा को ज़बीर भागलपुरी ने आगे बढ़ाने का सराहनीय काम किया है और एक कदम आगे बढ़ते हुए त्रिभाषी अर्थात उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी शब्दकोश तैयार किया है। यह उनका बड़ा कार्य है, जिसका स्वागत अवश्य होगा।
शब्दकोश के संकलक ज़बीर अहमद ने शब्दकोश के बारे में बात करते हुए कहा कि इस तरह का शब्दकोश अभी तक हमारे सामने नहीं आया है, जो त्रिभाषी हो। इस शब्दकोश की विशेषता को बताते हुए उन्होंने कहा कि बहुत सारे ऐसे शब्द हैं जिनका हम उपयोग करते हैं, लेकिन उनके अर्थ वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं। इस शब्दकोश में इन सभी शब्दों को मोती की तरह सजाया गया है, जो हमारे जीवन और बोलचाल में भी उपयोग होते हैं, उन्हें बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया गया है। आप इसका अध्ययन करेंगे तो आपको भी इसका एहसास होगा कि लोगों को इस शब्दकोश की कितनी जरूरत है। अब शब्दकोश आपके सामने है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ अब्दुल बासित हमीदी ने किया, जबकि प्रसिद्ध कथाकार शफीक मुशहदी ने इसकी अध्यक्षता की। आभार प्रकट करने वाले परवेज आलम थे।