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नीतीश कुमार का बिहार को अलविदा या भाजपा की विदाई की तस्वीर
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नीतीश कुमार का बिहार को अलविदा या भाजपा की विदाई की तस्वीर

Awaz E Bihar•5 मार्च 2026 को 01:50 pm बजे•0 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक ऐसे राजनेता हैं जिन्हें आसानी से समझना या उनकी राजनीति को भांपना मुश्किल है। आज की तस्वीर भले ही भाजपा को खुशियों का मौका दे रही हो, लेकिन इसके पीछे नीतीश कुमार की एक शातिर चाल है। नीतीश कुमार के शातिराना चालों से अच्छे-अच्छे राजनेताओं की पकड़ खुल जाती है और उन्हें गंगा में गोता लगाना ही पड़ता है। इस पृष्ठभूमि में, नीतीश कुमार या तो केंद्र सरकार को हिला देंगे या फिर बिहार की कुर्सी बचाने में कामयाब होंगे। अभी तो पर्चा नामांकन भरा है, राज्यसभा में 9 अप्रैल तक जाना है, नीतीश कुमार 9 अप्रैल तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे, इस बीच क्या खेल होगा, यह कहना मुश्किल है। वैसे, लालू ने कभी कहा था कि नीतीश कुमार के पेट में दांत हैं, नीतीश की राजनीति को करीब से जानने वाले मानते हैं कि वे आसानी से कुर्सी नहीं छोड़ेंगे। आगे क्या होगा, इसको जानने की कोशिश करते हैं। नीतीश कुमार विधान परिषद के सदस्य हैं, जब तक वे इससे इस्तीफा नहीं देते, तब तक बिहार में कुछ भी हो सकता है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो नीतीश कुमार राज्यसभा जाएंगे तो मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी, वे चंद्रबाबू से मिलकर इस मोदी सरकार का खात्मा कर सकते हैं, लेकिन यह बातें अभी बहुत दूर की हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि नीतीश कुमार जब तक विधान परिषद के सदस्य हैं, तब तक वे कुछ भी खेल सकते हैं। कहा जाता है कि राजनीति में कोई सगा नहीं होता और न ही कोई दुश्मन, कब क्या हो जाए, यह कहना मुश्किल है। वैसे, जदयू के नेताओं में बेचैनी फैल गई है और लोग विरोध कर रहे हैं, हालांकि फैसला तो बड़े नेता ही लेते हैं, फैसला हो भी गया नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए पर्चा भर दिया है। अंतिम बात यह है कि नीतीश कुमार इस समय दबाव में हैं और उनके आसपास के नेता भाजपा के ज़ेरे-साए में खड़े हो गए हैं, तो ज़ाहिर नीतीश कुमार को अपनी राजनीति को बचाना भी ज़रूरी है, इसीलिए यह कदम उठा रहे हैं, लेकिन अंदरूनी सतरों की मानें तो बिहार में अभी बहुत खेल बाकी है, यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार 16 मार्च को विधान परिषद से इस्तीफा दे देंगे। तो सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार, जो अपने विधायकों की मदद से सरकार चला रहे हैं, राज्यसभा सदस्य बनकर बिहार छोड़ देंगे? क्या वे प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बाद केंद्रीय राजनीति में जगह बना पाएंगे? फिर अगला सवाल यह उठता है कि बिहार का आगे क्या होगा? दूसरी ओर, इससे आरजेडी के एक पुराने आरोप की भी पुष्टि हो जाएगी कि भाजपा नीतीश को खत्म करने की तैयारी कर रही है। बिहार की राजनीति से नीतीश कुमार का निष्कासन जदयू के लिए आत्महत्या होगा, यह सिद्धांत पार्टी के अंदर नीतीश कुमार के सभी करीबी लोगों का है। नौकरशाही भी नहीं चाहती कि नीतीश चले जाएं, क्योंकि कोई भी नया मुख्यमंत्री उनके लिए सबसे ज्यादा परेशानी वाला होगा। भाजपा लंबे समय से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की तलाश में है, जिसकी वेटिंग लिस्ट में कई नाम हैं। 2020 के चुनाव के दौरान नित्यानंद राय का नाम सबसे आगे था, जब 2022-23 में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सुमरत चौधरी को संभावित मुख्यमंत्री बनाने का एलान किया था। नित्यानंद फिलहाल खामोश हैं, जबकि सुमरत खामोशी से तमाशा देख रहे हैं, और यह कहना गलत नहीं होगा कि वे इस अचानक होली के शोर से खुश हैं। तो यह फैसला किया गया है कि अमेश कुशवाहा राज्य बिहार जदयू के प्रभारी रहेंगे। हालांकि न केवल राजनीतिक दल, बल्कि आम लोग भी जानते हैं कि जदयू का मतलब नीतीश कुमार है, कोई और नहीं। इसके अलावा, अगर नीतीश कुमार राज्यसभा के जरिए केंद्र सरकार में वापस आते हैं तो वे बिहार की राजनीति से गायब हो जाएंगे। केंद्र में उप प्रधानमंत्री के रूप में भी वे बिहार के लिए कुछ नहीं कर पाएंगे, और निश्चित रूप से पार्टी के लिए नहीं। निशांत कुमार सीधे जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनेंगे, न ही वे एक बनना चाहेंगे, और न ही उनके आने पर नीतीश कुमार का कद हासिल कर पाएंगे। ऐसे में अगर अन्य दलों का जदयू को तबाह करने का मिशन भी कामयाब हो जाता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। क्योंकि आरसीपी सिंह की जदयू में वापसी का रास्ता रोक दिया गया है। राजीव रंजन सिंह, जिसे ललन सिंह के नाम से भी जाना जाता है, पहले ही केंद्रीय राजनीति में हैं और मोदी सरकार में मंत्री हैं। संजय झा पार्टी के कार्यकर्ता अध्यक्ष और राज्यसभा के सदस्य हैं। दोनों का संबंध उच्च जाति से है। ऐसे में लोक समानता पर आधारित पार्टी की नींव नीतीश कुमार का जाना पार्टी के लिए शायद ह
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